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कक्षा 12 ईंट मनके अस्थियाँ

ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ हड़प्पा सभ्यता — बोर्ड परीक्षा प्रश्नोत्तर (50 प्रश्न) कक्षा 12 — भारतीय इतिहास के कुछ विषय | विषय एक 1. हड़प्पा सभ्यता को किस अन्य नाम से जाना जाता है? उत्तर: हड़प्पा सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। 'हड़प्पा' शब्द उस स्थान से लिया गया है जहाँ इस सभ्यता की पहचान सबसे पहले हुई थी। 2. हड़प्पा सभ्यता का काल कब से कब तक माना जाता है? उत्तर: हड़प्पा सभ्यता का कुल समय काल 6000 ईसा पूर्व से 1300 ईसा पूर्व तक है। इसके तीन मुख्य चरण हैं: (i) प्रारंभिक हड़प्पा (6000-2600 ई.पू.), (ii) परिपक्व हड़प्पा (2600-1900 ई.पू.) - जो सबसे समृद्ध चरण है, (iii) उत्तर हड़प्पा (1900-1300 ई.पू.)। 3. हड़प्पाई मुहर किस पत्थर से बनाई जाती थी और उस पर क्या उत्कीर्ण होता था? उत्तर: हड़प्पाई मुहरें सेलखड़ी (steatite) नामक पत्थर से बनाई जाती थीं। इन पर सामान्य रूप से जानवरों के चित्र तथा एक अज्ञात लिपि के चिह्न उत्कीर्ण होते थे जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। 4. हड़प्पा सभ्यता के पाँच प्रमुख शहरों के नाम लिखिए। उत्तर: हड़प्पा सभ्यता के पाँच प्रमुख शहर हैं: (1) राखीगढ़ी, (2) मोहनजोदड़ो, (3) हड़प्पा, (4) धौलावीरा, (5) गनवेरीवाला। इनमें राखीगढ़ी सबसे बड़ा (550 हेक्टेयर) हड़प्पाकालीन शहर है। 5. हड़प्पा स्थलों से प्राप्त अनाज के दानों में कौन-कौन से अनाज शामिल थे? उत्तर: हड़प्पा स्थलों से प्राप्त अनाज के दानों में गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना तथा तिल शामिल हैं। बाजरे के दाने गुजरात के स्थलों से प्राप्त हुए थे। चावल के दाने अपेक्षाकृत कम पाए गए हैं। 6. हड़प्पावासी किन-किन जानवरों का पालन करते थे? उत्तर: हड़प्पा स्थलों से मिली जानवरों की हड्डियों में मवेशियों, भेड़, बकरी, भैंस तथा सूअर की हड्डियाँ शामिल हैं। पुरा-प्राणिविज्ञानियों के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि ये सभी जानवर पालतू थे। जंगली प्रजातियों जैसे वराह, हिरण तथा घड़ियाल की हड्डियाँ भी मिली हैं। 7. हड़प्पाई कृषि प्रौद्योगिकी के विषय में पुरातत्वविदों को क्या जानकारी मिलती है? उत्तर: मुहरों पर किए गए रेखांकन तथा मृण्मूर्तियाँ यह इंगित करती हैं कि खेत जोतने के लिए बैलों का प्रयोग होता था। चोलिस्तान के कई स्थलों और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी से बने हल के प्रतिरूप मिले हैं। कालीबंगन (राजस्थान) में जुते हुए खेत का साक्ष्य भी मिला है। 8. मोहनजोदड़ो की बस्ती किन दो भागों में विभाजित थी? इनका वर्णन कीजिए। उत्तर: मोहनजोदड़ो की बस्ती दो भागों में विभाजित थी: (1) दुर्ग (Citadel) - एक छोटा लेकिन ऊँचाई पर बनाया गया पश्चिमी भाग, जो कच्ची ईंटों के चबूतरे पर बना था और दीवार से घिरा था। (2) निचला शहर (Lower Town) - एक बड़ा लेकिन नीचे बनाया गया पूर्वी भाग जो आवासीय भवनों से युक्त था, यह भी दीवार से घिरा था। 9. हड़प्पा सभ्यता की जल निकास प्रणाली की विशेषताएँ लिखिए। उत्तर: हड़प्पा सभ्यता की जल निकास प्रणाली अत्यंत उन्नत थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं: (i) सड़कों और गलियों को लगभग 'ग्रिड' पद्धति में बनाया गया था जो एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। (ii) प्रत्येक घर की नालियाँ गली की नालियों से जुड़ी थीं। (iii) मुख्य नाले गारे में जमाई गई ईंटों से बने थे। (iv) घरों की नालियाँ पहले एक हौदी में खाली होती थीं। (v) बड़े नालों में सफाई के लिए हौदियाँ बनाई गई थीं। 10. मोहनजोदड़ो के 'विशाल स्नानागार' का वर्णन कीजिए। उत्तर: विशाल स्नानागार दुर्ग क्षेत्र में स्थित एक आयताकार जलाशय है जो चारों ओर से एक गलियारे से घिरा हुआ है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ: (i) उत्तरी और दक्षिणी भाग में जलाशय के तल तक जाने के लिए दो सीढ़ियाँ बनी थीं। (ii) जलाशय के किनारों पर ईंटें जमाकर और जिप्सम के गारे से इसे जलबद्ध किया गया था। (iii) इसके तीनों ओर कक्ष बने थे। (iv) जलाशय से पानी एक बड़े नाले में बह जाता था। यह संभवतः विशेष आनुष्ठानिक स्नान के लिए प्रयुक्त होता था। 11. हड़प्पा सभ्यता में ईंटों का क्या महत्व था? उनकी विशेषता बताइए। उत्तर: हड़प्पा सभ्यता में ईंटें अत्यंत महत्वपूर्ण थीं। इनकी विशेषताएँ: (i) ये धूप में सुखाकर अथवा भट्टी में पकाकर बनाई जाती थीं। (ii) इनका एक निश्चित अनुपात होता था - लंबाई और चौड़ाई, ऊँचाई की क्रमशः चार गुनी और दोगुनी होती थी। (iii) इस प्रकार की ईंटें सभी हड़प्पा बस्तियों में प्रयोग में लाई गई थीं। (iv) जम्मू से गुजरात तक पूरे क्षेत्र में ईंटें समान अनुपात की थीं, जो सभ्यता की एकरूपता को दर्शाता है। 12. हड़प्पा सभ्यता के मकानों की क्या विशेषताएँ थीं? उत्तर: हड़प्पा सभ्यता के मकानों की प्रमुख विशेषताएँ: (i) अधिकांश मकान एक आँगन पर केंद्रित थे जिसके चारों ओर कमरे बने थे। (ii) भूमि तल पर बनी दीवारों में खिड़कियाँ नहीं थीं। (iii) मुख्य द्वार से आंतरिक भाग या आँगन का सीधा अवलोकन नहीं होता था। (iv) हर घर का ईंटों के फर्श से बना एक स्नानघर होता था। (v) कुछ घरों में दूसरे तल या छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ थीं। (vi) कई आवासों में कुएँ थे। 13. हड़प्पावासियों के शवाधान के बारे में क्या जानकारी मिलती है? उत्तर: हड़प्पा स्थलों से मिले शवाधानों में आमतौर पर मृतकों को गर्तों में दफनाया गया था। कभी-कभी शवाधान गर्त की बनावट एक-दूसरे से भिन्न होती थी - कुछ स्थानों पर गर्त की सतहों पर ईंटों की चिनाई की गई थी। कुछ कब्रों में मृद्भांड तथा आभूषण मिले हैं। ऐसा लगता है कि हड़प्पा सभ्यता के निवासियों का मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफनाने में विश्वास नहीं था। 14. 'विलासिता' की वस्तुओं से सामाजिक भिन्नता का पता कैसे लगाया जाता है? उत्तर: पुरातत्वविद उन वस्तुओं को कीमती मानते हैं जो दुर्लभ हों अथवा महँगी, स्थानीय स्तर पर अनुपलब्ध पदार्थों से अथवा जटिल तकनीकों से बनी हों। जैसे फ्याँस के छोटे पात्र, लाजवर्द मणि, सोने के आभूषण आदि। ये वस्तुएँ मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसी बड़ी बस्तियों में केंद्रित हैं और छोटी बस्तियों में विरले ही मिलती हैं। इस वितरण से सामाजिक-आर्थिक भिन्नता का पता चलता है। 15. हड़प्पा सभ्यता में मनके बनाने के लिए किन-किन पदार्थों का प्रयोग होता था? उत्तर: मनकों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थों की विविधता उल्लेखनीय है: कार्नेलियन (सुंदर लाल रंग का), जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज़ तथा सेलखड़ी जैसे पत्थर; ताँबा, काँसा तथा सोने जैसी धातुएँ; तथा शंख, फ्याँस और पकी मिट्टी - इन सभी का प्रयोग मनके बनाने में होता था। कुछ मनके दो या उससे अधिक पत्थरों को आपस में जोड़कर बने थे और कुछ सोने के टोप वाले पत्थर के होते थे। 16. चन्हूदड़ो का क्या महत्व था? उत्तर: चन्हूदड़ो मोहनजोदड़ो (125 हेक्टेयर) की तुलना में एक बहुत छोटी (7 हेक्टेयर) बस्ती थी जो लगभग पूरी तरह से शिल्प-उत्पादन में संलग्न थी। यहाँ शिल्प कार्यों में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण तथा बाट बनाना सम्मिलित थे। यह स्थान शिल्प उत्पादन के विशिष्ट केंद्र का उदाहरण है। 17. हड़प्पावासी कच्चा माल कहाँ-कहाँ से प्राप्त करते थे? उत्तर: हड़प्पावासी कच्चा माल विभिन्न स्थानों से प्राप्त करते थे: (i) शंख - नागेश्वर और बालाकोट से। (ii) लाजवर्द मणि - अफगानिस्तान में शोर्तुघई से। (iii) कार्नेलियन - गुजरात में भड़ौच से। (iv) सेलखड़ी - दक्षिणी राजस्थान और उत्तरी गुजरात से। (v) ताँबा - राजस्थान के खेतड़ी अंचल से। (vi) सोना - दक्षिण भारत से। इसके अलावा संभवतः ओमान से भी ताँबा लाया जाता था। 18. हड़प्पा सभ्यता के मेसोपोटामिया के साथ संपर्क के क्या प्रमाण हैं? उत्तर: हड़प्पा और मेसोपोटामिया के संपर्क के प्रमाण: (i) मेसोपोटामिया के स्थलों से हड़प्पाई मुहरें, बाट, पासे तथा मनके मिले हैं। (ii) तीसरी सहस्राब्दि ईसा पूर्व के मेसोपोटामिया के लेखों में 'मेलुहा' (संभवतः हड़प्पाई क्षेत्र) से कार्नेलियन, लाजवर्द मणि, ताँबा, सोना तथा विविध प्रकार की लकड़ियाँ प्राप्त होने का उल्लेख है। (iii) ओमान से मिले हड़प्पाई मर्तबान और रासायनिक विश्लेषण से दोनों के साझा संबंध का पता चलता है। 19. हड़प्पाई मुहरों का क्या उपयोग होता था? उत्तर: मुहरों और मुद्रांकनों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था। सामान से भरे थैले का मुख रस्सी से बाँधा जाता था और गाँठ पर थोड़ी गीली मिट्टी जमाकर एक या अधिक मुहरों से दबाया जाता था, जिससे मिट्टी पर मुहरों की छाप पड़ जाती थी। यदि मुद्रांकन गंतव्य स्थान पर पहुँचने तक अक्षुण्ण रहा तो इसका अर्थ था कि थैले के साथ कोई छेड़-छाड़ नहीं की गई थी। इससे प्रेषक की पहचान का भी पता चलता था। 20. हड़प्पाई लिपि की विशेषताएँ क्या हैं? उत्तर: हड़प्पाई लिपि की प्रमुख विशेषताएँ: (i) यह अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। (ii) अधिकांश अभिलेख संक्षिप्त हैं; सबसे लंबे अभिलेख में लगभग 26 चिह्न हैं। (iii) यह लिपि वर्णमालीय नहीं थी क्योंकि इसमें चिह्नों की संख्या कहीं अधिक है - लगभग 375 से 400 के बीच। (iv) ऐसा प्रतीत होता है कि यह लिपि दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी। (v) मुहरों पर सामान्यतः एक पंक्ति में कुछ लिखा है। 21. हड़प्पाई बाट प्रणाली की विशेषताएँ बताइए। उत्तर: हड़प्पाई बाट प्रणाली की विशेषताएँ: (i) बाट सामान्यतः चर्ट नामक पत्थर से बनाए जाते थे और आमतौर पर किसी भी तरह के निशान से रहित घनाकार होते थे। (ii) निचले मानदंड द्विआधारी (1, 2, 4, 8, 16, 32, 160, 200, 320, 640) थे। (iii) ऊपरी मानदंड दशमलव प्रणाली का अनुसरण करते थे। (iv) छोटे बाटों का प्रयोग संभवतः आभूषणों और मनकों को तौलने के लिए किया जाता था। (v) धातु से बने तराजू के पलड़े भी मिले हैं। 22. हड़प्पाई समाज में सत्ता के स्वरूप के बारे में पुरातत्वविदों के क्या मत हैं? उत्तर: हड़प्पाई समाज में सत्ता के स्वरूप के बारे में विभिन्न मत हैं: (i) कुछ पुरातत्वविदों का मत है कि हड़प्पाई समाज में शासक नहीं थे तथा सभी की सामाजिक स्थिति समान थी। (ii) दूसरे पुरातत्वविद मानते हैं कि यहाँ कोई एक नहीं बल्कि कई शासक थे जैसे मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि के अपने अलग-अलग राजा होते थे। (iii) कुछ और यह तर्क देते हैं कि यह एक ही राज्य था जैसा कि पुरावस्तुओं में समानताओं, नियोजित बस्तियों के साक्ष्यों से स्पष्ट है। 23. हड़प्पा सभ्यता के पतन के क्या कारण माने जाते हैं? उत्तर: हड़प्पा सभ्यता के पतन के संभावित कारण: (i) जलवायु परिवर्तन। (ii) वनों की कटाई। (iii) अत्यधिक बाढ़। (iv) नदियों का सूख जाना और/या मार्ग बदल लेना। (v) भूमि का अत्यधिक उपयोग। लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थलों को त्याग दिया गया था। हालांकि इनमें से कुछ 'कारण' कुछ बस्तियों के संदर्भ में तो सही हो सकते हैं परंतु पूरी सभ्यता के पतन की व्याख्या नहीं करते। 24. उत्तर हड़प्पा (Late Harappan) काल की क्या विशेषताएँ थीं? उत्तर: उत्तर हड़प्पा (1900-1300 ई.पू.) काल की विशेषताएँ: (i) सभ्यता की विशिष्ट पुरावस्तुओं - बाटों, मुहरों तथा विशिष्ट मनकों का समाप्त हो जाना। (ii) लेखन, लंबी दूरी का व्यापार तथा शिल्प विशेषज्ञता भी समाप्त हो गई। (iii) सामान्यतः थोड़ी वस्तुओं के निर्माण के लिए थोड़ा ही माल प्रयोग में लाया जाता था। (iv) आवास निर्माण की तकनीकों का ह्रास हुआ। (v) बड़ी सार्वजनिक संरचनाओं का निर्माण बंद हो गया। ये संस्कृतियाँ एक ग्रामीण जीवनशैली की ओर संकेत करती हैं। 25. कनिंघम ने हड़प्पा सभ्यता की खोज में क्या भूल की? उत्तर: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर जनरल कनिंघम ने उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में पुरातात्विक उत्खनन आरंभ किए। उनकी मुख्य भूल यह थी कि वे अपने अन्वेषणों के मार्गदर्शन के लिए लिखित स्रोतों का प्रयोग अधिक पसंद करते थे। हड़प्पा जैसा पुरास्थल जो चीनी तीर्थयात्रियों के यात्रा-कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था और एक आरंभिक ऐतिहासिक शहर नहीं था, उनके ढाँचे में उपयुक्त नहीं बैठता था। एक अंग्रेज ने उन्हें एक हड़प्पाई मुहर दी पर वे उसे सही काल-खंड में नहीं रख सके। 26. जॉन मार्शल ने हड़प्पा सभ्यता की खोज में क्या योगदान दिया? उत्तर: भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल ने 1924 में पूरे विश्व के समक्ष सिंधु घाटी में एक नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की। दया राम साहनी द्वारा हड़प्पा में मुहरें खोज निकाली गईं और राखाल दास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो से समान मुहरें खोज निकालीं, जिससे अनुमान लगाया गया कि ये दोनों पुरास्थल एक ही पुरातात्विक संस्कृति के भाग थे। मार्शल भारत में कार्य करने वाले पहले पेशेवर पुरातत्वविद थे। 27. व्हीलर ने हड़प्पा पुरातत्व में क्या नई पद्धति अपनाई? उत्तर: 1944 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के डायरेक्टर जनरल बने आर.ई.एम. व्हीलर ने मार्शल की पद्धति की खामी दूर की। उन्होंने पहचाना कि एकसमान क्षैतिज इकाइयों के आधार पर खुदाई की बजाय टीले के स्तर विन्यास का अनुसरण करना अधिक आवश्यक था। साथ ही सेना के पूर्व-ब्रिगेडियर के रूप में उन्होंने पुरातत्व की पद्धति में एक सैनिक परिशुद्धता का समावेश भी किया। 28. राखीगढ़ी में हुए पुरातत्व-अनुवांशिक अनुसंधान के क्या परिणाम मिले? उत्तर: राखीगढ़ी में खुदाई से प्राप्त मानव कंकाल के अवशेषों से डीएनए निकाला गया। इस अनुसंधान के प्रमुख निष्कर्ष: (i) हड़प्पावासी इस क्षेत्र के मूल निवासी थे। (ii) हड़प्पावासियों की अनुवांशिक जड़ें 10,000 ईसा पूर्व तक जाती हैं। (iii) हड़प्पावासियों का डीएनए आज तक कायम है और दक्षिण एशियाई आबादी का अधिकांश हिस्सा उनके वंशज प्रतीत होते हैं। (iv) यह शोध तथाकथित आर्यों के बड़े पैमाने पर आगमन के सिद्धांत को पूर्णतः गलत सिद्ध करता है। 29. शवाधान के अध्ययन से सामाजिक भिन्नता का पता कैसे लगाया जाता है? उत्तर: शवाधान के अध्ययन से सामाजिक भिन्नता इस प्रकार पता लगाई जाती है: (i) मिस्र के विशाल पिरामिड राजकीय शवाधान थे जहाँ बहुत बड़ी मात्रा में धन-संपत्ति दफनाई गई थी। (ii) हड़प्पा स्थलों से मिले कुछ कब्रों में मृद्भांड तथा आभूषण मिले हैं जो मृत्योपरांत प्रयोग की मान्यता की ओर संकेत करते हैं। (iii) 1980 के दशक में हड़प्पा के कब्रिस्तान में एक पुरुष की खोपड़ी के समीप शंख के तीन छल्ले, जैस्पर के मनके तथा सैकड़ों की संख्या में सूक्ष्म मनकों से बना आभूषण मिला। (iv) कहीं-कहीं मृतकों को ताँबे के दर्पणों के साथ दफनाया गया था। 30. हड़प्पा सभ्यता में 'मालगोदाम' का क्या महत्व था? उत्तर: दुर्ग पर एक विशाल मालगोदाम की संरचना मिली है। इसके ईंटों से बने केवल निचले हिस्से शेष हैं जबकि ऊपरी हिस्से जो संभवतः लकड़ी से बने थे बहुत पहले नष्ट हो गए। इसका आकार बहुत बड़ा था। यह संभवतः किसी विशेष सार्वजनिक प्रयोजन के लिए था - शायद अनाज या अन्य वस्तुओं को संग्रहीत करने के लिए। यह हड़प्पाई समाज में एक केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था के प्रमाण के रूप में देखा जाता है। 31. हड़प्पा स्थलों की पहचान के लिए पुरातत्वविद क्या-क्या ढूँढते हैं? उत्तर: शिल्प-उत्पादन के केंद्रों की पहचान के लिए पुरातत्वविद सामान्यतः निम्नलिखित को ढूँढते हैं: (i) प्रस्तर पिंड, पूरे शंख तथा ताँबा-अयस्क जैसा कच्चा माल। (ii) औजार। (iii) अपूर्ण वस्तुएँ। (iv) त्याग दिया गया माल। (v) कूड़ा-करकट। उदाहरण के लिए, यदि वस्तुओं के निर्माण के लिए शंख अथवा पत्थर को काटा जाता था तो इन पदार्थों के टुकड़े कूड़े के रूप में उत्पादन के स्थान पर फेंक दिए जाते थे। 32. पुरावनस्पतिज्ञ (Palaeobotanist) और जीव-पुरातत्वविद (Zooarchaeologist) पुरातात्विक खोज में क्या भूमिका निभाते हैं? उत्तर: पुरावनस्पतिज्ञ प्राचीन वनस्पति के अध्ययन के विशेषज्ञ होते हैं। वे जले अनाज के दानों तथा बीजों की खोज से पुरातत्वविदों को आहार संबंधी आदतों के विषय में जानकारी प्राप्त करने में सफल होने में मदद करते हैं। जीव-पुरातत्वविद (पुरा-प्राणिविज्ञानी) हड़प्पा स्थलों से मिली जानवरों की हड्डियों का अध्ययन करते हैं जिससे यह पता चलता है कि कौन-कौन से जानवर पालतू थे और कौन-से जंगली। इनसे आहार एवं पशुपालन संबंधी जानकारी मिलती है। 33. धौलावीरा का क्या महत्व है? उत्तर: धौलावीरा गुजरात में स्थित एक महत्वपूर्ण हड़प्पाई नगर है। इसकी विशेषताएँ: (i) यहाँ पूरी बस्ती किलेबंद थी तथा शहर के कई हिस्से भी दीवारों से घेर कर अलग किए गए थे। (ii) यहाँ से जलाशयों के अवशेष मिले हैं जो संभवतः कृषि के लिए जल संचयन हेतु प्रयोग किए जाते थे। (iii) यहाँ से मनके बनाने के लिए छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं। (iv) यहाँ से एक प्राचीन सूचनापट्ट के अक्षर भी मिले हैं। 34. पुरातात्विक स्थल और टीला (Mound) क्या होता है? उत्तर: पुरातात्विक पुरास्थल वस्तुओं और संरचनाओं के निर्माण, प्रयोग और फिर उन्हें त्याग दिए जाने से बनते हैं। जब लोग एक ही स्थान पर नियमित रूप से रहते हैं तो भूमि-खंड के अनवरत उपयोग तथा पुनः उपयोग से आवासीय मलबों का निर्माण हो जाता है जिन्हें टीला कहते हैं। अल्पकालीन या स्थायी परित्याग की स्थिति में हवा या पानी की क्रियाशीलता और कटाव के कारण भूमि-खंड के स्वरूप में बदलाव आ जाता है। सामान्य तौर पर सबसे निचले स्तर प्राचीनतम और सबसे ऊपरी नवीनतम होते हैं। 35. हड़प्पा सभ्यता में सामान के परिवहन के कौन-कौन से साधन प्रयोग होते थे? उत्तर: हड़प्पा सभ्यता में सामान के परिवहन के प्रमुख साधन: (i) बैलगाड़ियाँ - मिट्टी से बने बैलगाड़ियों के खिलौने के प्रतिरूप मिले हैं जो इसके उपयोग के प्रमाण हैं। (ii) नदी-मार्ग - संभवतः सिंधु तथा उसकी उपनदियों के बगल में बने नदी-मार्ग। (iii) तटीय मार्ग - समुद्री व्यापार के लिए। (iv) नाव - मुहरों पर जहाजों तथा नावों के चित्रांकन मिले हैं जो जलमार्ग से संपर्क के संकेत हैं। 36. हड़प्पा सभ्यता में 'संचय' (Hoard) क्या होता है? उत्तर: 'संचय' शब्द लोगों द्वारा सावधानीपूर्वक अधिकांशतः पात्रों जैसे कि घड़ों में रखी गई वस्तुओं के लिए प्रयुक्त किया जाता है। ऐसे संचय आभूषणों के हो सकते थे अथवा धातुकर्मियों द्वारा पुनः प्रयोग के लिए सँभाल कर रखी गई धातुओं के। यदि किसी कारणवश मूल स्वामियों ने इन्हें पुनः प्राप्त नहीं किया तो ये तब तक अपने स्थान पर ही रहते हैं जब तक कोई पुरातत्वविद इन्हें खोज नहीं निकालता। हड़प्पा स्थलों से मिले सभी स्वर्णाभूषण संचयों से प्राप्त हुए थे। 37. हड़प्पाई ईंटों के निर्माण में नियोजन के क्या संकेत मिलते हैं? उत्तर: हड़प्पाई ईंटें नियोजन का स्पष्ट संकेत देती हैं: (i) इनका एक निश्चित अनुपात था - लंबाई और चौड़ाई, ऊँचाई की क्रमशः चार गुनी और दोगुनी होती थी। (ii) ये ईंटें धूप में सुखाकर या भट्टी में पकाकर बनाई जाती थीं। (iii) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जम्मू से गुजरात तक पूरे क्षेत्र में ईंटें समान अनुपात की थीं, जबकि इनका उत्पादन किसी एक केंद्र पर नहीं होता था। यह हड़प्पाई समाज में एक प्रकार के मानकीकरण और केंद्रीय नियंत्रण का प्रमाण है। 38. हड़प्पा की दुर्दशा से क्या तात्पर्य है? उत्तर: हड़प्पा सबसे पहले खोजा गया स्थल था, लेकिन इसे ईंट चुराने वालों ने बुरी तरह से नष्ट कर दिया था। 1875 में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पहले जनरल अलेक्जेंडर कनिंघम ने लिखा था कि प्राचीन स्थल से ले जाई गई ईंटों की मात्रा 'लगभग 100 मील' लंबी लाहौर तथा मुल्तान के बीच की रेल-पटरी के लिए ईंटें बिछाने के लिए पर्याप्त थी। इस प्रकार इस स्थल की कई प्राचीन संरचनाएँ नष्ट कर दी गईं। इसके विपरीत मोहनजोदड़ो कहीं बेहतर संरक्षित था। 39. मोहनजोदड़ो में मिली अवतल चक्की (Saddle Quern) का क्या उपयोग होता था? उत्तर: अवतल चक्कियाँ मोहनजोदड़ो में बड़ी संख्या में मिली हैं। इनका प्रयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता था। सामान्यतः ये चक्कियाँ स्थूलतः कठोर, कंकरीले, अग्निज अथवा बलुआ पत्थर से निर्मित थीं। इनके तल सामान्यतः उत्तल हैं, इसलिए इन्हें जमीन में अथवा मिट्टी में जमाकर रखा जाता होगा। दो मुख्य प्रकार की चक्कियाँ मिली हैं - एक वे जिन पर एक दूसरा छोटा पत्थर आगे-पीछे चलाया जाता था, और दूसरी वे जिनका प्रयोग संभवतः केवल सालन या तरी बनाने के लिए जड़ी-बूटियों तथा मसालों को कूटने के लिए किया जाता था। 40. हड़प्पाई 'फ्याँस' (Faience) क्या था? उत्तर: फ्याँस एक विशेष पदार्थ था जो घिसी हुई रेत अथवा बालू तथा रंग और चिपचिपे पदार्थ के मिश्रण को पका कर बनाया गया पदार्थ था। फ्याँस के छोटे पात्र संभवतः कीमती माने जाते थे क्योंकि इन्हें बनाना कठिन था। सुगंधित द्रव्यों के पात्रों के रूप में प्रयुक्त होते थे और अधिकांशतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा से मिले हैं। फ्याँस से बनी तकलियाँ भी मिली हैं। इससे भी मनके बनाए जाते थे। 41. पुरातत्वविद अप्रत्यक्ष साक्ष्यों का किस प्रकार उपयोग करते हैं? उत्तर: कभी-कभी पुरातत्वविदों को अप्रत्यक्ष साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरण के लिए: (i) हालाँकि कुछ हड़प्पा स्थलों से कपास के टुकड़े मिले हैं, पर पहनावे के विषय में जानने के लिए अप्रत्यक्ष साक्ष्यों जैसे मूर्तियों में चित्रण पर निर्भर रहना पड़ता है। (ii) किसी पुरावस्तु की उपयोगिता की समझ अक्सर आधुनिक समय में प्रयुक्त वस्तुओं से उनकी समानता पर आधारित होती है। (iii) पुरातत्वविद किसी पुरावस्तु की उपयोगिता को समझने का प्रयास उस संदर्भ के परीक्षण के माध्यम से भी करते हैं जिसमें वह मिली थी। 42. हड़प्पाई धर्म के पुनर्निर्माण में क्या समस्याएँ हैं? उत्तर: हड़प्पाई धर्म के पुनर्निर्माण में प्रमुख समस्याएँ: (i) हड़प्पाई लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है। (ii) 'आद्य शिव' मुहर पर बनी आकृति ऋग्वेद में दिए गए रुद्र के विवरण से मेल नहीं खाती। (iii) पत्थर की शंक्वाकार वस्तुओं को लिंग के रूप में वर्गीकृत किया गया है लेकिन ये पट्टों पर खेले जाने वाले खेलों में भी प्रयुक्त हो सकती थीं। (iv) नारी मृण्मूर्तियों को 'मातृदेवी' कहा गया है पर यह निश्चित नहीं है। (v) पुरातत्वविद अधिकांशतः ज्ञात से अज्ञात की ओर बढ़ते हैं जो 'धार्मिक' प्रतीक के संदर्भ में संदिग्ध रहती है। 43. हड़प्पा सभ्यता में सेलखड़ी के मनके कैसे बनाए जाते थे? उत्तर: सेलखड़ी एक बहुत मुलायम पत्थर है जिस पर आसानी से काम हो जाता था। मनके बनाने की प्रक्रिया: (i) कुछ मनके सेलखड़ी चूर्ण के लेप को साँचे में ढाल कर तैयार किए जाते थे, जिससे ठोस पत्थरों से बनने वाले केवल ज्यामितीय आकारों के विपरीत कई विविध आकारों के मनके बनाए जा सकते थे। (ii) पत्थर के पिंडों को पहले अपरिष्कृत आकारों में तोड़ा जाता था, और फिर बारीकी से शल्क निकाल कर इन्हें अंतिम रूप दिया जाता था। (iii) घिसाई, पॉलिश और इनमें छेद करने के साथ ही यह प्रक्रिया पूरी होती थी। 44. हड़प्पा में 'मेसोपोटामिया के पुरोहित-राजा' की मूर्ति की तुलना किससे की गई है? उत्तर: मोहनजोदड़ो में मिले एक पत्थर की मूर्ति को 'पुरोहित-राजा' की संज्ञा दी गई थी और यह नाम आज भी प्रचलित है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पुरातत्वविद मेसोपोटामिया के इतिहास तथा वहाँ के 'पुरोहित-राजाओं' से परिचित थे और यही समानताएँ उन्होंने सिंधु क्षेत्र में भी ढूँढीं। हालाँकि हड़प्पा सभ्यता की आनुष्ठानिक प्रथाएँ अभी तक ठीक प्रकार से समझी नहीं जा सकी हैं। 45. स्तर क्रम विज्ञान (Stratigraphy) क्या है? उत्तर: टीलों में मिले स्तरों के अध्ययन को स्तर क्रम विज्ञान कहा जाता है। सामान्य तौर पर सबसे निचले स्तर प्राचीनतम और सबसे ऊपरी, नवीनतम होते हैं। ये स्तर एक-दूसरे से रंग, प्रकृति और इनमें मिली पुरावस्तुओं के संदर्भ में भिन्न होते हैं। परित्यक्त स्तरों, जिन्हें 'बंजर स्तर' कहा जाता है, की पहचान इन सभी लक्षणों के अभाव से की जाती है। स्तरों में मिली पुरावस्तुओं को विशेष सांस्कृतिक काल-खंडों से संबद्ध किया जा सकता है जिससे एक पुरास्थल का पूरा सांस्कृतिक क्रम पता किया जा सकता है। 46. हड़प्पा सभ्यता की बस्तियों का वितरण किस प्रकार था? उत्तर: अब तक भारतीय उपमहाद्वीप में 2000 से अधिक हड़प्पा पुरातात्विक स्थल खोजे जा चुके हैं। अधिकांश स्थल सिंधु और सरस्वती नदी घाटियों के बीच स्थित पाए जाते हैं। लगभग 2/3 बस्तियाँ सरस्वती बेसिन में हैं जो इसके अत्यधिक महत्व को दर्शाती हैं। शेष विभिन्न श्रेणियों जैसे क्षेत्रीय केंद्र, कृषि गाँव, बंदरगाह और विनिर्माण केंद्र में हैं। इसके अलावा अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सिंध और पाकिस्तान के पंजाब प्रांतों में भी साक्ष्य मिले हैं। 47. हड़प्पा सभ्यता के अंत का 'आक्रमण सिद्धांत' क्या था और इसे क्यों अस्वीकार कर दिया गया? उत्तर: आर.ई.एम. व्हीलर ने 1947 में हड़प्पाई पुरातात्विक साक्ष्यों का उपमहाद्वीप में ज्ञात प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के साक्ष्यों से संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। उन्होंने 'आर्य आक्रमण' सिद्धांत का समर्थन किया। लेकिन 1960 के दशक में जॉर्ज डेल्स ने इसे चुनौती दी और दिखाया कि: (i) अधिकांश अस्थि-पंजर जिन संदर्भों में मिले हैं वे इंगित करती हैं कि ये अत्यंत लापरवाह तरीके से बनाए गए शवाधान थे। (ii) शहर के अंतिम काल से संबद्ध विनाश का कोई स्तर नहीं है। (iii) दुर्ग से अंतिम आत्मरक्षण के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। 48. लोथल का हड़प्पा सभ्यता में क्या महत्व था? उत्तर: लोथल गुजरात में स्थित एक महत्वपूर्ण हड़प्पाई नगर था। इसकी विशेषताएँ: (i) यह कार्नेलियन (गुजरात में भड़ौच से), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात से) और धातु (राजस्थान से) के स्रोतों के निकट स्थित था। (ii) यह संभवतः एक महत्वपूर्ण शिल्प उत्पादन केंद्र था - मनके और अन्य वस्तुएँ बनाई जाती थीं। (iii) यहाँ से छेद करने के विशेष उपकरण मिले हैं। (iv) यहाँ आवासों के निर्माण के लिए कच्ची ईंटों का प्रयोग हुआ था, वहीं नालियाँ पकी ईंटों से बनाई गई थीं। 49. हड़प्पा सभ्यता में 'गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति' का क्या महत्व है? उत्तर: खेतड़ी क्षेत्र (राजस्थान) में मिले साक्ष्यों को पुरातत्वविदों ने गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का नाम दिया है। इस संस्कृति के विशिष्ट मृद्भांड हड़प्पाई मृद्भांडों से भिन्न थे तथा यहाँ ताँबे की वस्तुओं की असाधारण संपदा मिली थी। ऐसा संभव है कि इस क्षेत्र के निवासी हड़प्पा सभ्यता के लोगों को ताँबा भेजते थे। यह हड़प्पावासियों द्वारा कच्चे माल की प्राप्ति के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में अभियान भेजने की नीति का उदाहरण है। 50. ईसा पूर्व (BCE) और ईसवी (CE) में क्या अंतर है? इनका प्रयोग क्यों किया जाता है? उत्तर: अंग्रेजी में BC (हिंदी में ई.पू.) का तात्पर्य 'बिफोर क्राइस्ट' (ईसा पूर्व) से है और AD (हिंदी में ई.) का तात्पर्य ईसा मसीह के जन्म के वर्ष से है। आजकल AD की जगह CE तथा BC की जगह BCE का प्रयोग होता है। CE अक्षरों का प्रयोग 'कॉमन एरा' तथा BCE का 'बिफोर कॉमन एरा' के लिए होता है। हम इन शब्दों का प्रयोग इसलिए करते हैं क्योंकि विश्व के अधिकांश देशों में अब 'कॉमन एरा' का प्रयोग सामान्य हो गया है।

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